मैं घर जा रहा हूँ।

दिव्य नारीत्व की फुसफुसाहट। पहचान का वह स्पर्श, मानो किसी खाली कैनवास पर ब्रश का कोमल स्पर्श।
एक बहुप्रतीक्षित आंतरिक संसाधन का चुपचाप उभरना।
आप इसे यूं ही हासिल नहीं कर सकते। आप इसे यूं ही उधार भी नहीं ले सकते। यह बात याद रखना।
मैं अंदर हूँ।
इसे खोजें।



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